Our Chairman

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श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह

ग्राम स्वराज, पंचायती राज एवं राष्ट्र निर्माण को समर्पित एक प्रेरणादायी जीवन यात्रा

“जीवन का उद्देश्य पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना है।”

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव ग्राम सभा और पंचायत है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तभी सार्थक होती है जब प्रत्येक नागरिक निर्णय प्रक्रिया में सहभागी बने, प्रत्येक पंचायत सक्षम हो तथा प्रत्येक गाँव अपने विकास का मार्ग स्वयं निर्धारित कर सके। इसी विचारधारा को अपने जीवन का ध्येय बनाकर लगभग छह दशकों तक निरंतर समाज, ग्राम स्वराज, पंचायती राज व्यवस्था और ग्रामीण नेतृत्व निर्माण के लिए कार्य करने वाले व्यक्तित्व का नाम है श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह।

श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह का जन्म 27 मई 1944 को बिहार राज्य के पटना जिले के मोकामा प्रखंड के ग्राम औंटा में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ। उनका प्रारम्भिक जीवन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहाँ उन्होंने गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता तथा संसाधनों की कमी को निकट से देखा। इन परिस्थितियों ने उनके मन में यह दृढ़ संकल्प उत्पन्न किया कि यदि भारत को वास्तविक रूप से विकसित बनाना है, तो विकास की शुरुआत गाँवों से ही करनी होगी।

युवावस्था से ही उन्होंने ग्राम सभा को केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, लोकतंत्र और सामूहिक निर्णय की सबसे बड़ी शक्ति माना। उन्होंने अपने गाँव में सामाजिक समूहों का गठन किया और लोगों को जाति, वर्ग तथा भेदभाव से ऊपर उठकर ग्राम विकास के लिए संगठित किया। उनका विश्वास था कि ग्राम सभा केवल बैठक नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रथम विद्यालय है।

पंचायती राज आंदोलन से जुड़ाव

वर्ष 1974 में श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने बिहार राज्य पंचायती राज परिषद के माध्यम से औपचारिक रूप से पंचायती राज आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी प्रारम्भ की। पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण, ग्राम सभा की सक्रियता और ग्रामीण नेतृत्व निर्माण के क्षेत्र में उनका कार्य शीघ्र ही पहचान बनाने लगा।

उनकी कार्यशैली ईमानदारी, अनुशासन, स्पष्ट सोच और जनसेवा पर आधारित थी। इन्हीं गुणों के कारण वे तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. लाल सिंह त्यागी की दृष्टि में आए। डॉ. त्यागी ने उनमें एक ऐसे समर्पित कार्यकर्ता को देखा जो पंचायतों को केवल प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानता था।

ग्रामीण जनता के विश्वास के कारण श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह कई वर्षों तक ग्राम प्रधान के रूप में निर्वाचित हुए। उन्होंने पंचायत को केवल योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक समरसता, विकास और जनभागीदारी का केंद्र बनाया।

उनकी संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें वर्ष 1980 में बिहार राज्य पंचायती राज परिषद का सचिव तथा वर्ष 1986 में महासचिव नियुक्त किया गया। इस अवधि में उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण, ग्रामीण नेतृत्व निर्माण तथा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किया।

पंचायती राज को संवैधानिक स्वरूप देने के प्रयास

1980 के दशक में भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा प्रारम्भ हुई। उस समय श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने पंचायतों को अधिकार, प्रशिक्षण और संस्थागत मजबूती प्रदान करने के पक्ष में अपने विचार एवं सुझाव विभिन्न मंचों तथा राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुँचाए। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी को भी ग्रामीण विकास, ग्राम स्वराज तथा पंचायती राज को मजबूत बनाने संबंधी अपने सुझाव प्रेषित किए।

श्री राजीव गांधी ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिलाने का ऐतिहासिक प्रयास किया। यद्यपि उस समय प्रस्तावित संशोधन पूर्ण रूप से पारित नहीं हो सका, परन्तु उसी विचारधारा ने आगे चलकर 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों का मार्ग प्रशस्त किया।

वर्ष 1992 में संसद द्वारा 73वाँ संविधान संशोधन (पंचायती राज संस्थाओं के लिए) तथा 74वाँ संविधान संशोधन (नगर निकायों के लिए) पारित किया गया, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने इसे ग्राम स्वराज की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना, परन्तु उनका यह भी स्पष्ट मत रहा कि केवल संवैधानिक अधिकार पर्याप्त नहीं हैं; पंचायतों को निरंतर प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग भी आवश्यक है।

अखिल भारतीय पंचायत परिषद के साथ राष्ट्रीय यात्रा

श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह की कार्यशैली, समर्पण और संगठन क्षमता से प्रभावित होकर स्वर्गीय डॉ. लाल सिंह त्यागी ने उन्हें वर्ष 1988 में अखिल भारतीय पंचायत परिषद में राष्ट्रीय महासचिव के रूप में आमंत्रित किया। इसके बाद उनका कार्यक्षेत्र बिहार से निकलकर पूरे देश में फैल गया।

अखिल भारतीय पंचायत परिषद में उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण, ग्राम स्वराज की अवधारणा, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, पंचायत सशक्तिकरण तथा संगठन के विस्तार के लिए निरंतर कार्य किया। उन्होंने परिषद की ऐतिहासिक विरासत, उसकी संपत्तियों और संगठनात्मक गरिमा की रक्षा के लिए अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना किया।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उन्होंने लगभग 38 वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी वेतन, मानदेय या व्यक्तिगत आर्थिक लाभ की अपेक्षा के अखिल भारतीय पंचायत परिषद की सेवा की। उनके लिए परिषद केवल एक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम रही है।

लोकतंत्र, समाज और प्रशिक्षण के प्रति उनकी दृष्टि

श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह सदैव यह मानते रहे हैं कि भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि प्रशिक्षित, उत्तरदायी और संवेदनशील नेतृत्व का निर्माण है।

इसी सोच के आधार पर उन्होंने “बालवंतराय मेहता पंचायती राज प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान” की परिकल्पना को आगे बढ़ाया। उनका विचार है कि पंचायत प्रतिनिधियों के साथ-साथ सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा युवा नेतृत्व को भी सामाजिक अभियांत्रिकी (Social Engineering), लोकतांत्रिक मूल्यों, ग्राम सभा की भूमिका, संविधान, जनभागीदारी और पंचायत प्रशासन का व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

उनका विश्वास है कि यदि जनप्रतिनिधि समाज की वास्तविक आवश्यकताओं, लोकतांत्रिक अधिकारों और जनता की भागीदारी को समझेंगे, तभी भारत का लोकतंत्र और अधिक सशक्त होगा।

वर्तमान भूमिका एवं भविष्य की प्रेरणा

आज श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह अखिल भारतीय पंचायत परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनका जीवन आज भी सादगी, अनुशासन, ईमानदारी और समाज सेवा का उदाहरण है।

वे निरंतर इस बात पर बल देते हैं कि पंचायतों के 29 संवैधानिक विषयों को केवल सरकारी विभागों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें एकीकृत विकास मॉडल के रूप में लागू किया जाए। उनका मानना है कि पंचायतें केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि स्थानीय विकास, सामाजिक नेतृत्व, जनभागीदारी और लोकतांत्रिक संस्कृति की आधारशिला हैं।

उनका सम्पूर्ण जीवन इस विश्वास का प्रतीक है कि—

“ग्राम सभा लोकतंत्र की आत्मा है।”

“पंचायत राष्ट्र निर्माण की प्रथम प्रयोगशाला है।”

“संगठित समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण करता है।”

जीवन संदेश

“सेवा मेरा धर्म है, पंचायत मेरी कर्मभूमि है, ग्राम सभा मेरी शक्ति है और राष्ट्र निर्माण मेरा आजीवन संकल्प है।”

“सशक्त पंचायत – सशक्त लोकतंत्र।”

“ग्रामोदय से राष्ट्रोदय ही भारत के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग है।”

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